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Post# E5036

01 Aug, 17 - 01 May, 18
आचार्य प्रशांत जी के साथ निजी साक्षात (India, , )

Posted on: Monday, 31 July, 2017  06:01
Updated On: Monday, 31 July, 2017  06:03
Expires On: Tuesday, 04 September, 2018  06:01
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हिबा, पिछले ७ साल से फाउंडेशन में स्वयंसेवक हैं। आचार्य जी के साथ निजी साक्षात्कार के बाद उन्होनें अपना अवलोकन सभी के साथ बाँटा: "नमस्कार, मेरा नाम हिबा है। आचार्य जी के संग पिछले 6.5 वर्षों से जुड़ी हूँ। हर एक लम्हा उनसे कुछ-न-कुछ सीखा है, पर जाने क्यों 'निजी साक्षात्कार' की बात ही बिल्कुल निराली मालूम पड़ी। कुछ प्रश्न जो की काफ़ी वक़्त सेे मन में थे, ऐसा लगा कि सब चीनी की तरह घुल गए पानी में और अंदाज़ा भी नहीं लगा। कुछ भी करने के बाद मन में हमेशा एक भावना रह ही जाती थी कि जैसे कुछ अभी भी ख़ाली सा है मन में, कुछ है जो पूरा सा नहीं होने देता। आचार्य जी ने काफ़ी ख़ूबसूरती से बताया, "ऊर्जा का जब तक पूरा इस्तेमाल नहीं होगा वो कहीं न कहीं और जाकर प्रस्फुटित होगी। जब तक काम करते वक़्त पूरी ऊर्जा नहीं लगाओगी तब तक बची हुई ऊर्जा ख़यालों और शिकायतों में ही लगेगी।" बात सुनने में इतनी ज़्यादा मालूम नहीं पड़ी, पर कल का पूरा दिन जब वैसे ही ग़ुज़ारा तब अनुभव हुआ कि कितना ज़बर्दस्त होगा अगर मैं रोज़ ही ऐसे जी उठूँ। माहौल का असर मुझपर बेइंतहां पड़ जाता था और गुज़र रहे लम्हें में विचलित भी हो जाया करती थी। आचार्य जी ने दवा के तौर पर दो सूत्र दिए: ' अनदेखा' और 'अनसुना' हो जाओ। जो चीज़ सत्य की ओर बढ़ने में ख़लल डाले, वहाँ पर यही कला काम आती है। साथ ही साथ तीन गुणों के बारे में आचार्य जी ने बताया: १. तामसिक गुण २. राजसिक गुण ३. सात्विक गुण तामसिक - जब मन पूर्ण रूप से अहंकार को समर्पित हो। राजसिक - जब मन पूर्ण रूप से लक्ष्य को समर्पित हो। सात्विक - जब मन पूर्ण रूप से सत्य को समर्पित हो। इन्हीं तीनों गुणों में से किसी एक गुण से हमारा जीवन चल रहा होता है। तामसिक, सबसे निचला तल होता है, फिर राजसिक आता है और फिर उच्चतम यानी कि सात्विक। यदि मन निचले तल पर है तो दूसरे तल पर ले कर आना होगा और यदि दूसरे पर है तो आखरी और सबसे ऊँचे तल पर आना है। धन्यवाद आचार्य जी। बहुत ही सादगी से आपने सारे प्रश्नों को मन में घोल दिया और एक हल्कापन दे दिया।"


वो चंद भाग्यशाली लोग जिनके मन में आचार्य जी संग निजी समय बिताने की इच्छा उठती हो, उनके लिए यह एक अनूठा अवसर है। वो या तो स्काइप द्वारा या स्वयं उपस्थित होकर आचार्य जी से मिल सकते हैं। ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com » या संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917





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